हुस्न के तिलस्म का व्यापार न किया कर
शौकिया इस तरह व्यभिचार न किया कर
उन गरीब बहनों की आह तुझे खा जाएगी
उनकी खुद्दारी का ऐसे संहार न किया कर
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
खो कर सब कुछ, वो पाना चाहता है
जिन्दगी को फिर से निभाना चाहता है
आस्था बाकी है जिन्दगी पर अभी तो
पुराने एहसासों को मिटाना चाहता है
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
खा जाएगी तुझे तेरी नादानियाँ
बेरहम बन रुलाएगी परेशानियाँ
वक्त पर संभल जा मेरे दोस्त
हाँथ रह जाएँगी बस गुमनामियाँ
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
रुखसार का वो तिल कातिल लगता है
तेरी अदाओं का यही हासिल लगता है
सजदे में ईश् के सर झुका लिया कर
वरना शीशाए-दिल नाकाबिल लगता है
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
रिस्तों ने बहुत लुटा है नादान बना कर
हुस्नवालों ने भी लुटा कद्रदान बना कर
लुटना मेरी फितरत नहीं, मजा आता है
खुद लुट्वाया, खुद को इन्सान बना कर
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
बालिस्त भर जमीं पर झूठ कहाँ छिपता है
सच का पूछो तो बिखर कर ही दीखता है
यकीं पर तो संस्कारों का सौगंध होता है
सच तो सच है बिना प्रयास ही टिकता है
गुनेश्वर