Wednesday, 18 September 2013



हुस्न के तिलस्म का व्यापार न किया कर
शौकिया इस तरह व्यभिचार न किया कर
उन गरीब बहनों की आह तुझे खा जाएगी
उनकी खुद्दारी का ऐसे संहार न किया कर
गुनेश्वर

मुक्तभाव-मुक्तक से परे
खो कर सब कुछ, वो पाना चाहता है
जिन्दगी को फिर से निभाना चाहता है
आस्था बाकी है जिन्दगी पर अभी तो
पुराने एहसासों को मिटाना चाहता है
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे

खा जाएगी तुझे तेरी नादानियाँ
बेरहम बन रुलाएगी परेशानियाँ
वक्त पर संभल जा मेरे दोस्त 
हाँथ रह जाएँगी बस गुमनामियाँ
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे

रुखसार का वो तिल कातिल लगता है
तेरी अदाओं का यही हासिल लगता है
सजदे में ईश् के सर झुका लिया कर
वरना शीशाए-दिल नाकाबिल लगता है
गुनेश्वर

मुक्तभाव-मुक्तक से परे
रिस्तों ने बहुत लुटा है नादान बना कर
हुस्नवालों ने भी लुटा कद्रदान बना कर
लुटना मेरी फितरत नहीं, मजा आता है 
खुद लुट्वाया, खुद को इन्सान बना कर
गुनेश्वर 
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
बालिस्त भर जमीं पर झूठ कहाँ छिपता है
सच का पूछो तो बिखर कर ही दीखता है
यकीं पर तो संस्कारों का सौगंध होता है
सच तो सच है बिना प्रयास ही टिकता है
गुनेश्वर  



Monday, 16 September 2013

मुक्तभाव ,,, मुक्तक से परे

शुक्रिया आभार दिल के करीब लगता है
जिसने भी दिया हो वो हबीब लगता है
साहित्य का सृजन, सुगन्धित करता है
सृजनात्मकता ही अपना नसीब लगता है
गुनेश्वर

मुक्तभाव ,,,  मुक्तक से परे

कौन रोया मेरी चौखट पर आकर    २१ 
किसने ये गुलदान सजाया है आज   २१   
दर्द को आज ये किसने आवाज दी   २१
कौन कद्रदान मुझे निभाया है आज २१
गुनेश्वर 
सुबह ने जब जब खुशनुमा सरगोशी ली
मेरे अंदर का दूब फिर लहराया है आज 
मैं अपने ही काँधे पर सर रख रोया हूँ
आँसुओं की कीमत किसने लगाया है आज





माथे की सिकन मिटाया है आज 
मेरे जज्बात को अपना बनाया है आज




मुझे इन्सान होने पर बहुत गर्व होता है
मेरे इस दिल से ही मुहब्बत सर्व होता है
ढूंढ़ता हूँ आज सबके दिलो में यंकी को
क्यों दिलों में अजीब सा कर्व होता है
देखो न तुम इस तरह मुझे 
आ भी जाओ न हमसफ़र मेरे तुम 
आ भी जाओ न 
देखो न तुम इस तरह मुझे

हूँ अकेला बहुत मेरी धडकनों को 
निभा जाओ न 
देखो न तुम इस तरह मुझे 
आ भी जाओ न

संभल गया हूँ बहुत 
उस दौर से कभी का 
मेरे भी अरमानो में 
दीप जला जाओ न
मेरे भी जज्बात सजा जाओ न
मेरे एहसासों में छा जाओ न
अपनी आँखों में बसा जाओ न 
देखो न तुम इस तरह मुझे 
हमसफर आ जाओ न
गुनेश्वर

Thursday, 12 September 2013


प्यारी बिटिया
जन्म दिन की ढेरों बधाइयाँ

तेरी हर सुबह खुशियों से जगमगाती रहे
जीवन के पल पल में तू मुस्कुराती रहे
समेट लेना अतिरेक आनंद का आँखों में
ये दिन भी बार बार हजार बार आती रहे
चाचा, चाची एवं परिवार
लफ्ज़ जो गीरा गजल
बह से ख़ारिज हो गया
 Neer se gahri teri baaten ,, chand ho poonam ka ,,, shajar shajar lahra uthta hai ek fool jo daali par aa rukta hai
मुक्तभाव ,, मुक्तक से परे
०१}

नीर से गहरी तेरी ये बातें हैं 
किस्मत की ये ही सौगातें है 
शजर शजर लहरा उठता है मुकद्दस प्रयास ओ जज्बाते हैं
०२}

शोख चंचला की भाग्य पहेली 
मुक्क्दर की है ये रात सहेली
लोहित कंठों के गुंजन में डूबी
स्वर माधुर्यता है कैसी अलबेली
गुनेश्वर 

एक फूल जो डाली पर आ रुकता है 

हो शोख बहुत चंचल भी तो हो 
ख़ामोशी नहीं अछ्छी लगती है 
मुखरित हो कर जब कहती हो 
बस मन यूँ ही तो गा उठता है 

जिन्दगी की सुबह में हैं शब्द बहुत 
तुम्हारी आँखों में एक हंसी सी है 
पाजेब का एक घुंघरू जो खनकता है 
जीवन का पलछिन चहचहा उठता है 

बगिया में एक फूल तुम्हारे नाम का 
ख़त में पैगाम भी तुम्हारे नाम का



 
 

Wednesday, 11 September 2013

भुत एवं वर्तमान
मुक्तक दिवस
एक कोशिश


पत्र मिला इस बात की ख़ुशी हुई 
वर्तमान परिवेश में हँसी हुई  
ख़त की सह्रदयता ख़त्म हो गई
व्यवहारिकता SMS में फँसी हुई
गुनेश्वर 
दर्द का सामन इक्कठा हो गया